
फरवरी १०, २०१३ – आज हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने अपनी मासिक गोष्ठी में कैनेडा के लेखक जसवीर कालरवी के उपन्यास "अमृत" पर चर्चा की। जसबीर का यह उपन्यास पहले पंजाबी में प्रकाशित हुआ था। इसका हिन्दी अनुवाद सुमन कुमार घई (हि.रा.गि.) ने २०११ में किया और उर्दू अनुवाद तलत ज़ारा ने पिछले वर्ष किया। हिन्दी में अनूदित अमृत का प्रकाशन और लोकार्पण हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने २०११ के वार्षिकोत्सव में किया था परन्तु उस समय इस उपन्यास पर चर्चा नहीं हो सकी थी। उर्दू संस्करण का प्रकाशन और लोकार्पण लाहौर (पाकिस्तान) में हुआ था। इस दिन पुस्तक पर चर्चा करने के लिए हिन्दी राइटर्स गिल्ड और तलत ज़ारा के अतिरिक्त पंजाबी साहित्यिक संस्था "कलम" के कुछ वक्ता/लेखक भी आए थे।
गोष्ठी के प्रथम भाग में काव्य पाठ था जिसका आरम्भ पारंपरिक रूप से इंद्रा वर्मा ने स्वरचित सरस्वती वंदना से किया। इसके बाद डॉ. शैलजा सक्सेना ने कैनेडा में हिन्दी साहित्य जगत के वयोवृद्ध सदस्य डॉ. ओंकार प्रसाद द्विवेदी के स्वर्गावस के बारे में सूचना दी और सभी ने मौन धार कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
इस गोष्ठी में न केवल हिन्दी की बल्कि उर्दू और पंजाबी की भी श्रेष्ठतर रचनाएँ सुनने को मिलीं। गोष्ठी के संचालन का कार्यभार डॉ. शैलजा सक्सेना ने उठाया और उन्होंने कवियों/कवयित्रियों से अनुनय किया कि अगर रचनाएँ आजकल समाज के घटनाक्रम के बारे में हो तो बेहतर होगा। कविता सुनाने वालों में थे पूनम कासलीवाल, लता पांडे, सविता अग्रवाल, कृष्णा वर्मा, पूनम चंद्रा "मनु", कैलाश महंत, सुमन कुमार घई, प्यारा सिंह (कलम), सुरजीत कौर (कलम), तलत ज़ारा, जसबीर कालरवी, मीना चोपड़ा, सरन घई, राज महेश्वरी, शैलजा सक्सेना, गोपाल बघेल, नीरज केसवानी और प्रमिला भार्गव थे। श्रोताओं ने कविताओं को बहुत सराहा।
तलत ज़ारा क्योंकि पंजाबी या हिन्दी पढ़ नहीं सकतीं तो उन्होंने पुस्तक को पहले उर्दू लिपी में फोन पर सुरजीत कौर से सुनते हुए टाईप किया और बाद में अनुवाद किया। उन्होंने उपन्यास के बारे में बात करते हुए कहा कि यह एक आम नावल नहीं है। इसमें "अमृत" एक ऐसे आनन्द को पाने के लिए प्रयास कर रहा है जो उसे न तो विभिन्न सभ्यताओं के दार्शनिकों से मिलता है, न ही विभिन्न धर्मों से और न ही समाज की रची हुई परंपराओं और संस्थानों से। यह कहानी उसका अंदरूनी सफ़र है और जो उसे अंत में उसी आनन्द की प्राप्ति करवाता है जिसे पाने के लिए वह दुनिया भर में भटका।
अगली वक्ता डॉ. इन्दु रायज़ादा थीं। उन्होंने इस उपन्यास पर लिखा अपना लेख पढ़ा। उपन्यास की कहानी का सारांश देते हुए उन्होंने उपन्यास में नायक की स्वयं से चल रही बहस की बात की जिसके उत्तर वह ग्रीक दार्शनिकों से लेकर, रूसी और पश्चिमी जगत के लेखकों के विचारों में खोजता है। उनके लेख में इस उपन्यास के अनेक पक्षों का विस्तृत विवेचन था। अंत में उन्होंने टिप्पणी की कि अगर "अमृत ने गीता पढ़ी होती तो शायद वह आत्महत्या की न सोचता"।

शैलजा सक्सेना ने इसके पश्चात सुमन कुमार घई को पुस्तक के बारे में कुछ शब्द कहने के लिए बुलाया। सुमन ने अपनी अनुवाद प्रक्रिया से बात शुरू की। उन्होंने कहा कि अनुवाद करते हुए उन्होंने विशेष ध्यान रखा कि मौलिक उपन्यास की पंजाबी महक हिन्दी अनुवाद में नहीं खोनी चाहिए। उन्होंने उपन्यास की कुछ आरम्भिक पंक्तियों को पढ़ा जिनको पढ़ने के बाद उन्होंने रोमांचित हो इसका अनुवाद करने की ठानी थी। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास नायक की बाह्य और आंतरिक दो समानान्तर चलने वाली यात्राएँ हैं जो उसे भारत से ऑस्ट्रेलिया और कैनेडा इत्यादि देशों से वापिस भारत ले आती हैं। वह अपने असंतोष का हल साहित्य, दर्शन, धर्म और सामाजिक रीतियों में नहीं खोज पाता और यात्रा के अंत में मिलने वाला उत्तर ही अमृत है। सुमन ने जसबीर के किए अध्ययन की छवि उसके उपन्यास में देखी। जसबीर का नायक जो स्वयं लेखक है और वह शायद जसबीर की बात को दोहराता है। लेखक ने केवल अध्यात्मिक जगत की समीक्षा नहीं कि उसने शिक्षा प्रणाली, राजनीति, साहित्य जगत और धार्मिक विसंगतियों को भी खंगाला है। उपन्यास एक पारंपरिक उपन्यास नहीं है परन्तु यह पाठक को सोचने के लिए मजबूर करता है और आत्मविश्लेषण की राह दिखाता है।"कलम" के संस्थापक और अध्यक्ष प्यारा सिंह ने समीक्षक के दायित्व के बारे में कहा और कहा कि समीक्षक को केवल पुस्तक के कथानक की बात करनी चाहिए और अपने पूर्वाग्रहों को अलग रखते हुए लेखक की कही बात और उनके पात्रों में लेखक को नहीं खोजना चाहिए।
इसके बाद शैलजा सक्सेना ने जसबीर कालरवी को इस उपन्यास की रचना प्रक्रिया के बारे में बोलने के लिए कहा। जसबीर ने कहा कि इस उपन्यास का जन्म कुछ प्रश्नों से हुआ। उन्होंने कहा कि बच्चे का बचपन से ही अनुकूलन (कंडीश्निंग) शुरू हो जाता है और कई बार वह बच्चा व्यस्क होकर इस प्रक्रिया पर प्रश्न करने लगता है। अमृत का नायक भी यही कर रहा है। कोई धर्म आत्मा और परमात्मा को अलग-अलग मानता है, कोई केवल आत्मा को ही मानता और कोई कहता है कि न आत्मा और न परमात्मा – तो फिर सच क्या है। यह स्वयं चल रही बहस अमृत का मानसिक द्वंद्व है।
अंत में शैलजा जी ने पंजाबी साहित्य के प्रसिद्ध वयोवृद्ध आलोचक बलराज चीमा जी को आमंत्रित किया। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि इस उत्कृष्ट साहित्य मंच पर हिन्दी, पंजाबी और उर्दू की रचनाएँ सुनने को मिलीं और उन्होंने कहा कि यह त्रिवेणी बहती रहनी चाहिए। उन्होंने अनुवाद प्रक्रिया के बारे में कहा कि अनुवादक को तलवार की धार पर चलते हुए एक-एक शब्द पर विचार करना पड़ता है। अंत में उन्होंने सभी को इस सफल कार्यक्रम के लिए बधाई दी और सभा का विसर्जन हुआ।
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२१ फरवरी, २००९ – कार्यक्रम का अगला चरण कहानी कार्यशाला का था। भगवत शरण जी ने अपनी कविता “तुम्हारी छवि” का पाठ किया। पाराशर गौड़ ने अपनी कहानी अधूरे सपने की चर्चा करते हुए कहा कि कहानी आकाश से नहीं उतरती अपितु अपने आस-पास घट रहा है वही कहानी है। भुवनेश्वरी पांडे ने अपने बचपन में पढ़ी हुई कहानियों को याद किया। राकेश तिवारी जो कि हिन्दी टाइम्स साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रकाशक व संपादक हैं ने कहा कहानी वस्तुतः स्थिति का बयान है। उन्होंने हाल में ही हुई घटना जिसमें मिसीसागा में तिरंगे का अपमान हुआ उसकी चर्चा करते हुए कहा कि कहानी तो उस दिन भी घटी है। आचार्य संदीप त्यागी ने कहा साहित्य शास्त्रियों का कहना है कि कविता की कसौटी गद्य होता है। कहानी में कहानी के उद्देश्य की पूर्ति होना आवश्यक है। उन्होंने प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की कहानियों को अपनी प्रिय कहानियाँ बताया। उन्होंने उदाहरण स्वरूप अपनी कविता “जवां भिखारिन” का पाठ करते हुए कविता के मूल में कहानी का होना प्रमाणित किया। डॉ. शैलजा सक्सेना ने कहानी की चर्चा करते हुए निर्मल सिद्धू की कहानी “अस्थि कलश” की विस्तार से समीक्षा की। उन्होंने हिन्दी राइटर्स गिल्ड के ई-सदस्य अमरेन्द्र कुमार के ब्लॉग पर कहानी पर लिखे हुए आलेख की भी चर्चा की और उपस्थित सदस्यों को प्रोत्साहित किया कि वह अमरेन्द्र के ब्लॉग पर जाकर अमरेन्द्र का कहानी के विषय में लिखा आलेख अवश्य पढ़ें। राज महेश्वरी ने कहा “कहानी वही अच्छी होती है जो अच्छी लगती है।“ उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक मानव कहानी लिख सकता है और उन्होंने हँसते हुए बताया कि उनकी नातिन की कहानी सारा-सारा दिन ख़त्म ही नहीं होती। आशा बर्मन कहा कि कहानियों से हमारा परिचय तो बचपन से ही आरम्भ हो जाता है। उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों में पात्र के अनुसार भाषा की विविधता की प्रशंसा की। उन्होंने आगे बचपन का संस्मरण सुनाते हुए बताया कि कैसे उनके दादा जी को भी प्रेमचंद की कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता है। कहानी लिखने के विषय में बोलते हुए उन्होंने बताया कि बचपन में जब घर-मोहल्ले के बच्चे जब उनके पिता जी को घेर कर कहानी सुनाने का आग्रह करते थे तो पिता जी कहानी शुरू तो करते थे पर उस कहानी के हर चरण को बच्चों द्वारा ही आगे बढ़वाते हुए एक सार्थक अंत करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि हमें अपने जीवन के अनुभवों के विषय में ही लिखना चाहिए। निर्मल सिद्धू ने अपनी कहानी की समीक्षा के लिए डॉ. शैलजा सक्सेना का धन्यवाद किया और उन्होंने कहा कि कहानी केवल किसी समस्या की चर्चा ही नहीं करे बल्कि उसका समाधान भी सुझाए। उन्होंने अपने विद्यार्थी काल में पढ़े चंद्रधर शर्मा गुलेरी को अपना प्रिय लेखक बताया। सरन घई ने अपनी नई पत्रिका के प्रकाशन की घोषणा की और एक लघुकथा सुनाते हुए कहा कि इस कहानी में पात्रों का परिचय नहीं देने की आवश्यकता नहीं बल्कि हर पात्र का परिचय स्वतः होता चला जाता ही। कार्यशाला का अन्त सुमन कुमार घई ने किया।